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शनिवार, 14 जुलाई 2012

गुवाहटी से क्षुब्द होकर ......

आगे बढ़ना है हमे ,
आसमां छूना है ,
नया भारत कहना है खुद को ...
फ़िर भी गुडगाँव , गुवाहटी
या अपने ही घर में ,
क्यों आधा भारत ....
 सिर्फ सिसकियाँ भरता है ?
रात को घर से निकलते डरता है
बर्बरता से मुर्दित अस्मिता सहलाता है
नमकीन आंसुओं का मरहम लगता है ....

और शेष आधा ...
या तो नीच निशाचर बन
भूखे भेडिये सा
शिकार ढूंढता 
रस्ते पर घूमता है
या फ़िर निस्तब्द तमाशबीन
घर की इज्ज़त
तार तार होते बस ताकता है ।

मंदिर में जिसको पूजते हैं
उसी को सड़कों पर
वेहशी बन कर नोचते हैं
क्या आगे बढ़ रहे हैं हम ,
क्या तो आसमा छुएंगे
और क्या ही नया है हम में ....
क्या ही नया है ??

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आज Valentine's के दिन

आज  Valentine's के दिन
मोबाइल में तेरी तस्वीर
कहती है कि इस दूरी, उदासी
में भी इक उम्मीद है
रिस-रिस कर बहती नमकीन ज़िन्दगी
में भी कोई कतरा है जो अमृत है
गुप मुरझाये अंधियारे में भी  
तेरी मुस्कराहट से कुछ  रोशनी  है
बंजर वीरानो में भी खनक तेरी आवाज़ की
अक्सर  मिसरी घोलती है
खुश्क हवाओं में एहसास है
कि खुशबु तेरी से कोई कोना अब भी महकता है
अभी बस आहटें हैं, एहसास हैं, अन्देसे हैं...
और बस इंतज़ार है.. बस इंतज़ार है....






रविवार, 6 जून 2010

याद

यह पंक्तियाँ समर्पित हैं मेरी प्रेरणा, मेरी अर्धांगिनी को, जिनके साथ बिताया हर सुखी  पल मुझे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति होने का एहसास करता है और हर दुःख का पल जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला देता है .. 

क्या बात हुई क्या कही सुनी,
दो आँसूं , इक मुस्कान मिली
आज फिर तन्हा सिरहाने में
क्या बयां करूँ क्या जला बुझा,
बस  याद जली विराने में

जां बस ग़मगीन न हो
यूँ  फ़िक्र न कर
सब बढ़ता है सब कट जाएगा
देख वो बादल छटता है
कोई हौले से मुस्काता है
ख़ुशी कोस दूर बस चौक पे है
क्या बात हुई कुछ देर हुई आने में
इक दिन तन्हा और कटा सिरहाने में .........

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

संदेसे


Dallas Lake के किनारे बैठे बैठे ,
मैंने पानी पे न जाने  कितने हर्फ़ उकेरे ,
और तेरी याद में लिखे ख़त लिए ,
लहरें दूसरे किनारे चल दी
इस उम्मीद में  कि उस ओर 
तुम बेसब्री से किसी संदेसे का
इंतज़ार करती होगी  शायद
और इस बात से बिलकुल बेखबर
कि दूसरा किनारा केवल चंद कोस दूर है
पर Seattle उस से भी आगे मीलों दूर 
पता नहीं यह संदेसे तुम्हे मिलेंगे भी या नहीं
पर मैंने तेरी याद में कुछ लफ्ज़ गढ़े ज़रूर हैं...


सोमवार, 8 मार्च 2010

मैं तुझको बहा आया हूँ



वक़्त के बहते दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ 
यादों का तेरी इक गठरा था
मैं उसको छुपा आया हूँ
भुला पाना मुमकिन न था
आँखों में पल पल तू लहराती थी
नाकाम मोह्हब्बत है मेरी तू
मुझको यह बताती थी
भागना चाहता था बहुत
पर जाता भी तो कहाँ
जिस ओर गया , जिस छोर गया
नज़र हरसूं तू आती है
मगर आज़ाद पंछी हूँ मैं
ना जी सकता था
तेरी यादों के पिंजरे में
इसलिए इस दिल को
तेरे चंगुल से छुड़ा लाया हूँ
वक़्त के दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ

शनिवार, 6 मार्च 2010

तुम आओ

तुम आओ कि हम 
आस जगाये बैठे हैं 
तुम आओ कि हम 
पलकें बिछाएं बैठे है 
तुम आओ जल्दी कि 
आस टूटने लगी है 
तुम जल्दी आओ कि 
पलकें भीगने लगी हैं..

इंतज़ार हमने किया है बहुत
कि  तुम  आओ
घुट -घुट  के  हमने  जिया  है  बहुत
कि  तुम  आओ
इंतज़ार कि लौ बुझ
 सी गयी  है 
जल्दी  आओ
सांस  थक  सी  गयी  है
तुम  जल्दी  आओ

तुम  जल्दी  आ  जाओ
कि मैं  राह  ताकता  न  रह  जाऊं
वक़्त  कि  इस  धार  में  ही  न  बह  जाऊं
अतेव  मेरे  प्रिय  तुम  आओ
तुम  जल्दी  आ  जाओ 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

क्यों?

यह क्या घटा है?
यह कौन सा बादल छाया है?
क्यों भीगी सारी दुनिया है?
क्यों सूखी मेरी काया है?
यह क्या अजब उदासी है?
क्यों रूह इस कदर प्यासी है?

क्यों ऐसा लगता है?
यह मुस्कराहट जो खिली है 
वो बस लबों से मिली है
दिल से न कोई नाता है 
क्यों हर चेहरा बस 

मुखोटा सा नज़र आता है
क्यों लगता है कि शब्द

फूटते तो हैं होंठों से 
पर सच से न कोई नाता है 


क्यों लोग सुनते तो हैं 

समझते नहीं 
मुस्कुरा तो लेते हैं 
पर हसते नहीं 




क्यों लगता है मेरी ज़िन्दगी मेरी नहीं 

किसी और के हाथ है 
खुशनुमा है तभी तक 
जब तक किसी का साथ है 
क्यों मन की डोर 
किसी और के पास है 
यूँ निराशा चहुँ ओर 
न ही कोई आस है 
क्यों अब शब्दों पर 
होता नहीं विश्वास है 
क्यों लगता है सब दूर 

की जबके सब इतना पास है

क्यों मन का पंछी 

आसमान चाहता है 
पर अपने ही बनाये पिंजरे में 
तरपता रह जाता है 

क्यों?

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

सहरा

लोग खा जाते हैं धोखा 
होंठों पे फैली तबसुम से
समझते हैं बाग़ हूँ मैं
पर तड़पता हुआ सा सहरा हूँ मैं 
अपने ही ग़मों से बोझिल 
एक ठहरा हुआ सा दरया हूँ मैं 
लोग उथले रिश्तों को भी 
जी भर कर पीते हैं 
पर गहरे नाते जोड़ के भी मैं 
सदा से प्यासा हूँ मैं...

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

एक बात

इन खामोशियों को जो सुन सकता था 
इस दुनिया के शोर ने 
शायद उसे बहरा कर दिया है 
खामोशियां बधिर कानो से टकरा 
रेशा रेशा बिखर रही हैं 
टूट रही हैं .. ख़त्म हो रही हैं ..
इन आँखों के आंसूं कुछ  कहना तो चाहते हैं 
पर बेबस  ठिठक कर रह जाते हैं 
और एक  बात कहीं रास्ते में दम  तोड़कर रह जाती है ...