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बुधवार, 30 जुलाई 2014

सिक्के



जेब में पलछिन्नो के,
कुछ अठन्नी भर सिक्के रखे हैं,
कुछ कच्चे, कुछ पक्के,
कुछ दुक्कियाँ, कुछ इक्के रखे हैं,
यह सिक्के मैं तुझ तक पहुँचाऊँ कैसे,
कमबख़्त फ़ासला बहुत है, 
पल भर में उड़ कर आऊँ कैसे !


रविवार, 7 मार्च 2010

निशान

वह आये पास हमारे
लिए पैगाम दोस्ती के सारे
हैरान हम भी हुए
देख अंदाज़ यह प्यारे

" मगर रहने दीजिये
हमें माफ़ कीजिये
चोट खा चुके हैं
इस खेल में
अब दिलचस्बी नहीं अपनी
किसी मेल में "
हाथ रखकर मेरे दिल पर
वह प्यार से बोले
" एक ज़ख्म है तुम्हारे दिल पे
मानते हैं
चोट खा चुके हो तुम ये
जानते हैं
पर ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
कुछ देर में भर जाते हैं "

" हाँ, सच है,
ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
जल्द भर जाते हैं
पर निशान,
यह कमबख्त निशान,
फिर भी रह जाते हैं !!"

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

मैं क्या हूँ


आज सोचने बैठा हूँ कि मैं क्या हूँ 
सोचूं तो इक ज़र्रा, इक सूखा पत्ता हूँ 
सोचूं तो इक चट्टान इक तूफ़ान हूँ
उमीदों, सपनो, आशाओं का इक दरया हूँ 
इक जोश का झोंका हूँ , हवा हूँ मैं 
इक आंसूं हूँ पलकों पे ठहरा हूँ 
इक याद हूँ सीने में दबा हूँ 
इक फ़रियाद हूँ होंठों पे सजा हूँ मैं 
इक बादल हूँ बिन बात बहकता हूँ  
इक शोला हूँ दिन रात सुलगता हूँ 

फिर देखूं तो बस क्या हूँ मैं 
वो सोच जो तेरे दिल में है 
बस गीली मिटटी हूँ 
मन से, कर्म से अपने 
रौंद सहला सवार मुझको  
जो तेरे दिल में है वो बना दे मुझको .....

एक बात

इन खामोशियों को जो सुन सकता था 
इस दुनिया के शोर ने 
शायद उसे बहरा कर दिया है 
खामोशियां बधिर कानो से टकरा 
रेशा रेशा बिखर रही हैं 
टूट रही हैं .. ख़त्म हो रही हैं ..
इन आँखों के आंसूं कुछ  कहना तो चाहते हैं 
पर बेबस  ठिठक कर रह जाते हैं 
और एक  बात कहीं रास्ते में दम  तोड़कर रह जाती है ...

रविवार, 8 नवंबर 2009

मुसाफिर

रात  के मुसाफिर चलता जा रे
सराबोर हो अंधियारे में
चाहे चहुँ  दिशाएं
चाहे सराबोर हो जाये
दुनिया बहकावों के गलियारों में   
सुनसान  गली के नुक्कड़ पे
देख  उजाला तकता होगा
सुबह का सूरज  देख  ज़रा
अभी गली के मोड़ पे होगा 
बस  कोस  भर की दूरी है
कदम भर का फासला है......

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