संघर्ष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संघर्ष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

घोंसले का मेहमान





रोज़ सूरज का चेहरा देख,

उम्मीदों की हवाओं पर, 

पंख फैला देता हूँ ,
और सूरज पंख जला कर,
जिस्म ख़ाक कर देता है ।
 
अरे भटके मेघ ज़रा

सूरज को गले लगा
हवा तू मुझे कंधे पे उठा
चल ज़रा ज़ोर लगा !

अपने घोंसले में मेहमान 
बनना अब सहा नहीं जाता
बिना तोतली हँसी के
अब रहा नहीं जाता ।


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

गुब्बार

पारवती चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश कर रही थी । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा-जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

अभी कल ही की तो बात है जब वो दुल्हन के लाल जोड़े में शर्मा रही थी । दूर पास की बड़ी-बूढी औरतें उसे आसिसें  दे रही थी , हम उम्र अठकेलियाँ कर रही थी और छोटी सपनो भरी निगाहों से उसे निहार रही थी । पारवती का ब्याह पास ही के गाँव के लम्बे-चौड़े नौजवान से तय हुआ था । तो क्या हुआ अगर वो कुछ सांवली थी उसके भाईयों  ने लेन-देन में कोई कसर नहीं रखी थी । कुलजीत  नाम था उसके गबरू लाड़े का । अम्बरसर में कपड़े की मिल में काम करता था । अब गाँव में शहर में नौकरी करने वालों का अलग ही रुतबा रहता था । वही रुतबा उसके पति था तो सभी ब्याह से खूब खुश थे ।

पारवती के  भी पहले कुछ  साल खूब सुख से बीते । उसका ख़सम हर 4-5 महीने में 10-15 दिन की छुट्टी ले के आता, साथ में एक टोटा सूट का लाता , कुछ तोहफ़े थमाता , कुछ दिन मौज कर फिर लौट जाता अपनी नौकरी को । पारवती ने कई बार साथ ले जाने को कहा तो पति ने यह कह कर टाल  दिया की घर पे बूढी माँ का ख्याल कौन रखेगा और फिर उसे घर का इंतज़ाम भी तो करना है  । अभी जिस एक कमरे में वो रहता है वहां थोड़े ही ले जा सकता है उसे । जल्दी ही दो कमरे के क्वार्टर का इंतज़ाम कर के साथ ले जायेगा ।

दिन बीतते रहे, अभी शादी का दूसरा साल चढ़ा ही था कि पारवती का पैर भारी हो गया । अब पति के पास नया बहाना तैयार हो गया कि इस हालत में वहां उसका ख्याल कैसे रखेगा । उसे तो काम पर जाना होता है पीछे से कुछ ऊँच-नीच हो गयी तो? घर पर रहेगी तो माँ देखभाल कर सकेगी ।देखते ही देखते नौ महीने भी गुज़र गए पर पति ने मुड़ के दर्शन नहीं दिए, न ही कभी हाल ही पूछा  । हाँ जब उसकी माँ ने किसी से कह कर तार भिजवाया कि चाँद सा बेटा हुआ है तो भागा चला आया । दो चार दिन खेल कर और हाथ में कुछ पैसे थमा कर लौट गया । फिर महीनों कोई खैर खबर नहीं । हाँ कभी कभी कुछ सौ रुपये का मनी आर्डर आ जाता।

यह सिलसिला चलता रहा - कुछ चार या पांच सावन तो गुज़र ही गए होंगे । कुलजीत को कई ख़त लिखे , अम्बरसर जाते लोगों के मुहं संदेसे भिजवाए पर कोई जवाब नहीं । दूर के एक रिश्तेदार को जब कसमे खिलायीं तो उसने वो बताया जिसने पारवती के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी ।

कुलजीत जिस घर में किराये पे रहता था उसकी मालकिन एक बेवा थी और उस से दस साल बड़ी भी, वह उससे दूजा ब्याह रचा बैठा था । दहेज़ में उसे 15 साल की बेटी भी मिली थी ।यह सब सुनकर पारवती तो जैसे टूट गयी थी, जीने की इच्छा त्याग कर खुदकुशी करने चली थी पर उसके बेटे का मासूम चेहरा उसे रोक गया । उसने जीने की ठानी अपने बेटे के लिए । जो भी हुआ उसमें उस बच्चे का कोई कसूर न था तो वो क्यों खज्जल हो । पारवती ने गाँव के ही कुछ घरों में बर्तन धोने का काम पकड़ा और जैसे तैसे बेटे के लालन पालन में जुट गयी । मनी ऑर्डर अभी भी आते थे पर उसने उन्हें लेना या हाथ लगाना मुनासिब न समझा और हर बार उलटे हाथ लौटा दिया ।

इसके बाद पारवती ने जैसे बरसों का हिसाब रखना बंद ही कर दिया । बस अपने बेटे को देख यह सोचती कि  कब बड़ा हो और वो कोई सुख का दिन देखे ।  बेटा भी इस कच्ची उम्र में ही सयाना हो गया था । अपनी माँ के दर्द को समझता उसे गले लगा कर अक्सर कहता की जब वो बड़ा हो जायेगा तो उसे कोई काम नहीं करने देगा। पारवती इसी आस को सीने से लगा दिन काटती रही ।

फिर मानसून की एक शाम खपरैलों पे खड़-खड़ बजती बारिश के बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई । किवाड़ खोले तो देखा  एक जाना पहचाना सा चेहरा जिसे पानी रिसते प्लास्टिक के बोरे के नीचे से झाँक रहा है । कुलजीत ही था । पारवती ने कुछ नहीं कहा दरवाज़ा खुला छोड़ चौके पर आकर अपना काम करने लगी ।

कुलजीत सामने आ बिन्ने पर बैठ गया । कुछ देर रसोई में सन्नाटा रहा जिसे सिर्फ हांडी में चलती कड़छी की आवाज़ गाहे-बगाहे चीर देती। जब सन्नाटा बहरा करने लगा तो कुलजीत से रहा नहीं गया तो खुद ही आप बीती सुनाने लगा । दूसरी बीवी की लड़की सोलह साल की उम्र में ही गली के किसी आवारा लोफ़र के साथ भाग पड़ी । किसी तरह मान मनोती कर के दोनों परिवारों में मामला सुलटाया और लड़का लड़की की सलीके से शादी करवाई पर वो एक नंबर का कमीना और लालची निकला । दो महीने में ही घर पर  आ धमका कि एक ही लड़की है तो घर इसके नाम करो । कुलजीत की दूसरी बीवी भी गरम दिमाग की थी उसने जब जवाई को हड़काया तो बात तू तू मैं मैं तक पहुँच गयी । तैश में आकर जवाई ने बन्दूक निकल ली । कुलजीत ने बीच बचाव की कोशिश की तो इस हाथ पायी में गोली चल गयी और माँ बेटी दोनों को लील गयी ।

पुलिस ने ससुर दामाद दोनों को धर दबोचा और क़त्ल का मुकदमा ठोक डाला । आखिरकार वकीलों की जेबों पर अपनी जमा पूँजी लुटा कर कुलजीत बरी तो हो गया और दामाद को भी सजा दिलवा ही दी । पर इस रस्साकशी में लगभग दो साल बीत गए और नौकरी जो गयी सो गयी घर भी बिक गया । जब कोई ठौर समझ नहीं आया तो कुलजीत को पारवती की सुध आई । अब सामने बैठ कर गिडगिडा रहा  था कि माफ़ कर दो और साथ रहने दो । गलती का एहसास भी हो गया है और सजा भी मिल गयी है । अब सिर्फ उसका और बेटे का ख्याल रखना चाहता  है । प्रायश्चित करना चाहता है ।

पारवती को  जो अब तक चुप चाप चूल्हे पर राखी हांडी में कड़छी चला रही थी न जाने क्या सूजा कि उसने चूल्हे से सुलगता लकड़ी का चप्पर निकला और कुलजीत के मुहं पर दे मारा । कुलजीत दर्द से कराहता बाहर  की ओर भागा कि शायद बरसते पानी में कुछ ठंडक मिले । पारवती भी जलती मशाल सा चप्पर लिए पीछे लपकी ।

"कम्ज़र्त ! कमीने ! कभी फिर यहाँ का रुख भी किया तो जिंदा जला दूंगी। दोबारा कभी नज़र मत आना ।"

कुलजीत बरसते पानी के परदे में आँख झपकते खो गया । जब तक पारवती को होश आया चप्पर की आग बुझ चुकी थी । वो रसोई की और भारी कदमो से लौट चली।

चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश करने लगी  । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आज Valentine's के दिन

आज  Valentine's के दिन
मोबाइल में तेरी तस्वीर
कहती है कि इस दूरी, उदासी
में भी इक उम्मीद है
रिस-रिस कर बहती नमकीन ज़िन्दगी
में भी कोई कतरा है जो अमृत है
गुप मुरझाये अंधियारे में भी  
तेरी मुस्कराहट से कुछ  रोशनी  है
बंजर वीरानो में भी खनक तेरी आवाज़ की
अक्सर  मिसरी घोलती है
खुश्क हवाओं में एहसास है
कि खुशबु तेरी से कोई कोना अब भी महकता है
अभी बस आहटें हैं, एहसास हैं, अन्देसे हैं...
और बस इंतज़ार है.. बस इंतज़ार है....






रविवार, 6 जून 2010

याद

यह पंक्तियाँ समर्पित हैं मेरी प्रेरणा, मेरी अर्धांगिनी को, जिनके साथ बिताया हर सुखी  पल मुझे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति होने का एहसास करता है और हर दुःख का पल जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला देता है .. 

क्या बात हुई क्या कही सुनी,
दो आँसूं , इक मुस्कान मिली
आज फिर तन्हा सिरहाने में
क्या बयां करूँ क्या जला बुझा,
बस  याद जली विराने में

जां बस ग़मगीन न हो
यूँ  फ़िक्र न कर
सब बढ़ता है सब कट जाएगा
देख वो बादल छटता है
कोई हौले से मुस्काता है
ख़ुशी कोस दूर बस चौक पे है
क्या बात हुई कुछ देर हुई आने में
इक दिन तन्हा और कटा सिरहाने में .........

रविवार, 8 नवंबर 2009

मुसाफिर

रात  के मुसाफिर चलता जा रे
सराबोर हो अंधियारे में
चाहे चहुँ  दिशाएं
चाहे सराबोर हो जाये
दुनिया बहकावों के गलियारों में   
सुनसान  गली के नुक्कड़ पे
देख  उजाला तकता होगा
सुबह का सूरज  देख  ज़रा
अभी गली के मोड़ पे होगा 
बस  कोस  भर की दूरी है
कदम भर का फासला है......

.