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बुधवार, 30 जुलाई 2014

सिक्के



जेब में पलछिन्नो के,
कुछ अठन्नी भर सिक्के रखे हैं,
कुछ कच्चे, कुछ पक्के,
कुछ दुक्कियाँ, कुछ इक्के रखे हैं,
यह सिक्के मैं तुझ तक पहुँचाऊँ कैसे,
कमबख़्त फ़ासला बहुत है, 
पल भर में उड़ कर आऊँ कैसे !


गुरुवार, 3 जुलाई 2014

घोंसले का मेहमान





रोज़ सूरज का चेहरा देख,

उम्मीदों की हवाओं पर, 

पंख फैला देता हूँ ,
और सूरज पंख जला कर,
जिस्म ख़ाक कर देता है ।
 
अरे भटके मेघ ज़रा

सूरज को गले लगा
हवा तू मुझे कंधे पे उठा
चल ज़रा ज़ोर लगा !

अपने घोंसले में मेहमान 
बनना अब सहा नहीं जाता
बिना तोतली हँसी के
अब रहा नहीं जाता ।


मंगलवार, 16 जुलाई 2013

वक़्त



काश वक़्त किसी जर्जर हवेली की,
वो पुरानी स्थिर सीढ़ी सा होता,
पल भर में भाग कर अपने, 
माज़ी के माथे को चूम लेता ।
पर वक़त किसी चमकते मौल के,
ऐस्केलेटर सा है शायद,
जिसपर भागना मना है, 
मंज़िल तक ले तो जायेगा,
पर अपनी रफ़्तार से, 
बदले वक़्त की यही क़ीमत है शायद ।।

शुक्रवार, 10 मई 2013

यादों की चादर





महफ़िलो के करघों पर, 
जब दोस्तों की बातें 
उलझते, सुलझते फिर उलझते,
दिलकश दास्ताँ 
बन उभरती है 
दिल में यादों की चादर
थोड़ी और लम्बी
 थोड़ी और रंगी 
हो जाती है !

शनिवार, 14 जुलाई 2012

गुवाहटी से क्षुब्द होकर ......

आगे बढ़ना है हमे ,
आसमां छूना है ,
नया भारत कहना है खुद को ...
फ़िर भी गुडगाँव , गुवाहटी
या अपने ही घर में ,
क्यों आधा भारत ....
 सिर्फ सिसकियाँ भरता है ?
रात को घर से निकलते डरता है
बर्बरता से मुर्दित अस्मिता सहलाता है
नमकीन आंसुओं का मरहम लगता है ....

और शेष आधा ...
या तो नीच निशाचर बन
भूखे भेडिये सा
शिकार ढूंढता 
रस्ते पर घूमता है
या फ़िर निस्तब्द तमाशबीन
घर की इज्ज़त
तार तार होते बस ताकता है ।

मंदिर में जिसको पूजते हैं
उसी को सड़कों पर
वेहशी बन कर नोचते हैं
क्या आगे बढ़ रहे हैं हम ,
क्या तो आसमा छुएंगे
और क्या ही नया है हम में ....
क्या ही नया है ??

गुरुवार, 14 जून 2012

कविता और मैं


बिन भाव कविता है क्या ?
मात्र शब्द ही तो हैं ,
और भाव क्या है?
मेरा अक्स ही तो हैं ,
तो कविता मुझसे भिन्न कैसे हो ?
यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?
फिर कैसे करूँ शिकवा ,
जब कोई कहे, 
मज़ा नहीं आया 
कि दिल तक पहुंची नहीं, 
अरे पगले !
कभी हम दिल तक पहुंचे हैं, 
जो कविता दिल तक पहुंचेगी,
यह तो खुद मुझ ही में उलझी है ।
मेरी शंकाओं पर पली है ,
मेरे ही भय पे खेली है,
तो मुझ से आगे कैसे निकले ,
  यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?  

शनिवार, 26 मई 2012

नन्ही सी कोंपल


किसी की घटती बढ़ती
धडकनों के बीच
एक  नन्ही सी
कोंपल  बढ़ रही है
कुदरत  की क्या
अजब तरकीब है
कि एक  ज़िन्दगी में
इक  और  ज़िन्दगी
करवट ले रही  है

कभी घर पे तेरे
कान  लगा
तेरी धडकनों को
सुनता हूँ
टोह कर
तेरी हरकतों को
कैसे खेलूँगा तुझसे
ख्वाब यह बुनता हूँ

हंसी को तेरी
किल्कारियों को
सोचकर आंसूं आते हैं
जब साक्षात्  तू
गोद में खेलेगी
जाने क्या हाल  होगा
ये  सोच   पल-पल 
तेरा इंतज़ार करता हूँ.....

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

हल्का हल्का....


हल्की सी मुस्कराहट,
हल्का हल्का सा नशा,
हल्की सी जुल्फों की बदरी ,
हल्का हल्का सा कहकशा ,
हल्की सी ख़ामोशी तेरी ,
हल्का सा मेरा बहक जाना,
हल्का सा नज़र का झुकना,
हल्का सा शर्मा जाना,
हल्का सा चुपके से तकना,
हल्का से नज़रें चुराना,
सबकुछ हल्का सा जानना,
हल्का सा अंजान हो जाना,
हल्की सी हकीक़त ,
हल्का सा कोई अफसाना,
हल्का सा ख्वाब का बुनना ,
हल्का सा सच हो जाना,
हल्की सी सवालों की शिकान,
हल्का सा हल का खो जाना ,
हल्की हल्की तेरी अदाओं से,
हलक पे मेरे बन जाना ,
हल्की हल्की सी दिल्लगी ये,
हल्का सा कोई रोग पुराना ...........

बुधवार, 1 जून 2011

तुम्हे पाकर यूँ लगा जैसे



तुम्हे पाकर यूँ  लगा जैसे
यह दुनिया छोटी हो गयी है 
दिशाएं कितनी पास आ गयी हैं 
क्षितिज जैसे सिमट के बाहों में आ गया है 
जैसे ज़िन्दगी हर पल, हर लम्हा,
इक नया रंग, नया राग है 
जैसे सारी दुनिया की चहल पहल, 
हमारी बातों में समा गयी है 
जैसे इक अधुरा सा सपना, 
अब पूरा हो चला है 
जैसे मन की बातें, 
अब सिर्फ बातें नहीं रही, 
मीठे जज़्बात हो गयी हैं 
जैसे पन्नो में जोड़ा गया शब्दों के ताना-बाना,
अब केवल कविता नहीं रहा
एक सजीव सृष्टि हो चला है 
जिसे मैं छू सकता हूँ , 
महसूस कर सकता हूँ ,
 कस कर गले लगा सकता हूँ   
जैसे ज़िन्दगी की पूरी किताब,
तेरे होंठों से निकले तीन शब्दों में समा गयी है 
यूँ लगा की जैसे मेरी ख़ुशी, मेरा दर्द, 
अब मेरा नहीं रहा है 
किसी ने सांझा कर लिया है 
सचमुच यह जीवन भी मेरा कहाँ है 
यह तो कब का तेरा हो गया है .......

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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आज Valentine's के दिन

आज  Valentine's के दिन
मोबाइल में तेरी तस्वीर
कहती है कि इस दूरी, उदासी
में भी इक उम्मीद है
रिस-रिस कर बहती नमकीन ज़िन्दगी
में भी कोई कतरा है जो अमृत है
गुप मुरझाये अंधियारे में भी  
तेरी मुस्कराहट से कुछ  रोशनी  है
बंजर वीरानो में भी खनक तेरी आवाज़ की
अक्सर  मिसरी घोलती है
खुश्क हवाओं में एहसास है
कि खुशबु तेरी से कोई कोना अब भी महकता है
अभी बस आहटें हैं, एहसास हैं, अन्देसे हैं...
और बस इंतज़ार है.. बस इंतज़ार है....






रविवार, 19 सितंबर 2010

ज़िन्दगी तू रूकती नहीं...

यह कविता मेरे माता पिता को समर्पित  है और साथ  ही  विश्व के समस्त अभिभावकों को, जो अपने जीवन की तमाम  छोटी  बड़ी खुशियों का परित्याग  करते है ताकि उनके बच्चे एक  बेहतर जीवन  जी सकें, अपने ख्वाबों को पूरा कर सकें । और कहीं  शायद  उम्मीद करते हैं  कि जब वो बूढ़े हों तो यही  बच्चे उनके  बुढ़ापे  की लाठी, उनका सहारा बनें .....


 ज़िन्दगी तू रूकती नहीं ,
शायद तूने रुकना सीखा नहीं 
तू भागती रही और मैं तुझसे कदम 
मिलाने कि जद्दोजहद में जूझता रहा 
पर तूने रुकना नहीं सीखा है 
पैरों में पंख लगे हैं तेरे  शायद ....

कब पालने में थी , कब गोद में 
और  कब कंधे पर 
कब तूने उंगली पकड़ कर चलना सीखा 
जाने कौन, कहाँ से कोई हौंसला जागा 
और तू  हाथ छुड़ा  के दौड़ दी   
भागा मैं तेरे पीछे, थोड़ी  रफ़्तार भी तेज़ की
पर  हर नयी पीढ़ी पिछली से तेज़ भागती है 
आखिर मैंने मोह त्याग ही दिया 
ताकि तू उड़ सके , आसमा की बुलंदी को छू सके
अपने सपनो को पूरा कर सके....
आज दूर खड़ा तेरे फैले पंखों को निहारता हूँ 
ख़ुशी कि तेरी किलकारियों को  
किसी मधुर गीत कि तरह सुनता हूँ 
 और इंतज़ार करता हूँ 
कि जिस हाथ को थामतूने चलना सीखा है 
उस बूढ़े हाथ की लाठी बनने का भी

शायद तू कभी ख्याल करे ....



रविवार, 6 जून 2010

याद

यह पंक्तियाँ समर्पित हैं मेरी प्रेरणा, मेरी अर्धांगिनी को, जिनके साथ बिताया हर सुखी  पल मुझे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति होने का एहसास करता है और हर दुःख का पल जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला देता है .. 

क्या बात हुई क्या कही सुनी,
दो आँसूं , इक मुस्कान मिली
आज फिर तन्हा सिरहाने में
क्या बयां करूँ क्या जला बुझा,
बस  याद जली विराने में

जां बस ग़मगीन न हो
यूँ  फ़िक्र न कर
सब बढ़ता है सब कट जाएगा
देख वो बादल छटता है
कोई हौले से मुस्काता है
ख़ुशी कोस दूर बस चौक पे है
क्या बात हुई कुछ देर हुई आने में
इक दिन तन्हा और कटा सिरहाने में .........

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

संदेसे


Dallas Lake के किनारे बैठे बैठे ,
मैंने पानी पे न जाने  कितने हर्फ़ उकेरे ,
और तेरी याद में लिखे ख़त लिए ,
लहरें दूसरे किनारे चल दी
इस उम्मीद में  कि उस ओर 
तुम बेसब्री से किसी संदेसे का
इंतज़ार करती होगी  शायद
और इस बात से बिलकुल बेखबर
कि दूसरा किनारा केवल चंद कोस दूर है
पर Seattle उस से भी आगे मीलों दूर 
पता नहीं यह संदेसे तुम्हे मिलेंगे भी या नहीं
पर मैंने तेरी याद में कुछ लफ्ज़ गढ़े ज़रूर हैं...


सोमवार, 8 मार्च 2010

मैं तुझको बहा आया हूँ



वक़्त के बहते दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ 
यादों का तेरी इक गठरा था
मैं उसको छुपा आया हूँ
भुला पाना मुमकिन न था
आँखों में पल पल तू लहराती थी
नाकाम मोह्हब्बत है मेरी तू
मुझको यह बताती थी
भागना चाहता था बहुत
पर जाता भी तो कहाँ
जिस ओर गया , जिस छोर गया
नज़र हरसूं तू आती है
मगर आज़ाद पंछी हूँ मैं
ना जी सकता था
तेरी यादों के पिंजरे में
इसलिए इस दिल को
तेरे चंगुल से छुड़ा लाया हूँ
वक़्त के दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ

रविवार, 7 मार्च 2010

तुम ठहरना प्रिय

सुख के गीत में सुर मिलाने 
सब आयेंगे मगर 
दुःख की रुदाली में कन्धा देने 
तुम ठहरना  प्रिय 

बुलंदी में पलकों पे बिठाने 
सब आयेंगे मगर 
धूल सनी यह देह उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

भरा मयखाना गले उतारने 
सब आयेंगे मगर 
कल टूटे प्याले उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

महका चमन साँसों में बसाने 
सब आयेंगे मगर 
कल मुरझाये फूल  उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

आज रसिल यह काय भोगने 
सब आयेंगे मगर 
कल सूखे ठूंठ को पानी देने 
तुम ठहरना प्रिय  

सफ़र में कदम मिलाने 
सब आयेंगे मगर 
अंतिम पड़ाव  पर मेरे करीब 
तुम ठहरना प्रिय

आज मुझ से सहारा लेने 
सब आयेंगे मगर 
कल कमज़ोर यह जिस्म थामने
तुम ठहरना प्रिय .....

निशान

वह आये पास हमारे
लिए पैगाम दोस्ती के सारे
हैरान हम भी हुए
देख अंदाज़ यह प्यारे

" मगर रहने दीजिये
हमें माफ़ कीजिये
चोट खा चुके हैं
इस खेल में
अब दिलचस्बी नहीं अपनी
किसी मेल में "
हाथ रखकर मेरे दिल पर
वह प्यार से बोले
" एक ज़ख्म है तुम्हारे दिल पे
मानते हैं
चोट खा चुके हो तुम ये
जानते हैं
पर ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
कुछ देर में भर जाते हैं "

" हाँ, सच है,
ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
जल्द भर जाते हैं
पर निशान,
यह कमबख्त निशान,
फिर भी रह जाते हैं !!"

शनिवार, 6 मार्च 2010

तुम आओ

तुम आओ कि हम 
आस जगाये बैठे हैं 
तुम आओ कि हम 
पलकें बिछाएं बैठे है 
तुम आओ जल्दी कि 
आस टूटने लगी है 
तुम जल्दी आओ कि 
पलकें भीगने लगी हैं..

इंतज़ार हमने किया है बहुत
कि  तुम  आओ
घुट -घुट  के  हमने  जिया  है  बहुत
कि  तुम  आओ
इंतज़ार कि लौ बुझ
 सी गयी  है 
जल्दी  आओ
सांस  थक  सी  गयी  है
तुम  जल्दी  आओ

तुम  जल्दी  आ  जाओ
कि मैं  राह  ताकता  न  रह  जाऊं
वक़्त  कि  इस  धार  में  ही  न  बह  जाऊं
अतेव  मेरे  प्रिय  तुम  आओ
तुम  जल्दी  आ  जाओ 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

ऐसा होता है क्यों?

ऐसा होता है क्यों? 
कि तुम्हारे सामने आते ही 
धड़कन रुक सी जाती है 
सांस थम सी जाती है 
गला सूख जाता है 
ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है 
आँखें चमक उठती है 
मैं कहना चाहता तो हूँ, कुछ मगर 
न जाने क्यों 
सब भूल सा जाता हूँ 
क्यों होता है ऐसा?
ऐसा होता है क्यों? 

और ऐसा भी क्यों होता है 
कि तुम्हारे जाते ही 
धड़कन डूब जाती है 
साँसे भोझिल हो जाती हैं 
गला रूंध जाता है 
जुबान कुछ कहना चाहती नहीं 
आँखें छलक उठती हैं 
क्यों होता है ऐसा?
ऐसा होता है क्यों?

ऐसा क्यों होता है 
यह क्या जादू है 
कि तुम्हारे आगाज़ पर,
फिर तुम्हारी परवाज़ पर 
मैं बेकाबू सा 
इक दीवाना सा हो जाता हूँ 
तुम शम्मा बन जाती हो 
मैं परवाना सा हो जाता हूँ 
क्यों होता है ऐसा?
आखिर, ऐसा होता है क्यों?

बुधवार, 3 मार्च 2010

मेरे ख्वाबों में परी बन आती हो तुम

मेरे ख्वाबों में परी बन आती हो तुम
आँखों में बूँद बूँद नशा बन उतर जाती हो तुम 
मैं अवाक् खड़ा देखता भर रह जाता हूँ
जाने कब सामने आ गुज़र भी जाती हो तुम

कोई खुशबु हो हवा में घुली हो तुम
कोई रात हो चांदनी में धूलि हो तुम 
किसी आग की धधकती ज्वाला सी तुम
लहराते कोमल आँचल की शीतल छाया सी तुम

मेरे वजूद पर घटा बन छा जाती हो तुम
इक मुस्कान से अनगिनत मोती लुटाती हो तुम
मेरे ख्वाबों की तामील हो तुम
मेरे वजूद में, मुझ में शामिल हो तुम

जाने कौन हो, कहाँ से आती हो तुम?
क्यों बार बार मुझे यूँ सताती हो तुम?
मगर चाहे जो हो जहाँ हो तुम
मेरी हमराज़, हमकदम, मेरी जान हो तुम

मेरी हमराज़, हमकदम, मेरी जान हो तुम ....

मंगलवार, 2 मार्च 2010

मैं तुझको क्या समझूँ ज़िन्दगी?

मैं तुझको क्या समझूँ ज़िन्दगी?
तुम अक्सर पास आती हो 
एक कविता बनकर 
सप्त सुरों में लिपटी 
अगिनत भावों को समेटे 
जाने कितने अर्थ समाये 
अबुध पहेली बन
उलझा सा छोड़ जाती हो ...

मैं तुझको क्या समझूँ ज़िन्दगी?
तुम अक्सर पास आती हो 
एक महबूबा बन
वक़्त के दिए ज़ख्म सहलाती हो 
प्यार के गीतों में 
ख़ुशी की लाखों सौगातें दे जाती हो 
और जब दर्द कम होने लगता है 
ज़ख्म भरने लगता है 
वही ज़ख्म कुरेदकर 
बेवफा,  तड़पता छोड़ जाती हो...

मैं तुझको क्या समझूँ ज़िन्दगी?