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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

एक छोटी सी राम कहानी...

एक था राम | एक था रावण | दोनों टकराये, शायद रूहें बदल गयी | राम की रूह रावण के साथ मर गयी और रावण की रूह राम में जिंदा रही | सीता पहले भी अपमानित हुई और बाद में भी | 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

आरना के पहले जन्मदिन पर




साढ़े आठ मोती जब
तेरी हँसी से झाँकते है 
सवेरा घुटनों पे चल के
मेरी गोद में आता है ।

रब्ब और क़रीब लगता है
उसकी आरती जब लोरी बन
तेरी नींदों के कैनवस पर
ख़्वाबों को बुनती है

"माँ करें दिन रात सेवा,
पर बाप-बेटी आपस में चमचे हैं"
'उजा' की झूठी जलन के ताने
अब गीतों से लगते हैं
माँ की ममता के अफ़साने 
जबसे जगरातों में देखें हैं ।

राक्षस की जान नन्हे से तोते में
ऐसी कहानियों पे यक़ीं नहीं था मुझको
पर जब से तू आई है 'आरना'
'इजे' को कहानी का यक़ीं आ गया है ।

हसीं तेरी जब रूह का शर्बत बनती है
डबडबाई आँखे जब कलेजे को छनती है
राक्षस की जान नन्हे से तोते में
ख़ुद-ब्-खुद यक़ीं आ जाता है
सवेरा  आजकल ख़ुद घुटनों पे 
चल के मेरी गोद में आता है ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

बारीशों में नंगे सिर




बारीशों में नंगे सिर,
कभी चल के देखा है,
बूँदें लपक के,
चूमने को आती हैं,
गाड़ी के शीशे,
नीचे कर के देखो
हवा कुछ और ही,
गीत सुनाती है
बस बिन कुछ कहे,
यूँही मुस्कुरा के देखो,
अंजाने खुद-ब-खुद
अपने से लगते हैं
अपने ही डर की दीवारों 
में जो क़ैद हैं हम 
इक ईंट गिरा के देखो
दुनिया कुछ हॅसीन लगती है…


मंगलवार, 16 जुलाई 2013

वक़्त



काश वक़्त किसी जर्जर हवेली की,
वो पुरानी स्थिर सीढ़ी सा होता,
पल भर में भाग कर अपने, 
माज़ी के माथे को चूम लेता ।
पर वक़त किसी चमकते मौल के,
ऐस्केलेटर सा है शायद,
जिसपर भागना मना है, 
मंज़िल तक ले तो जायेगा,
पर अपनी रफ़्तार से, 
बदले वक़्त की यही क़ीमत है शायद ।।

शुक्रवार, 10 मई 2013

यादों की चादर





महफ़िलो के करघों पर, 
जब दोस्तों की बातें 
उलझते, सुलझते फिर उलझते,
दिलकश दास्ताँ 
बन उभरती है 
दिल में यादों की चादर
थोड़ी और लम्बी
 थोड़ी और रंगी 
हो जाती है !

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

अंतर्द्वंद



कौन रौंद रहा है तुम्हें ?
और कौन है जो मुझे 
पल पल पीस रहा है ?
सोचा वक़्त को इलज़ाम दूँ ,
किस्मत को बुरा भला कहूँ,
रब को भी कोसना चाहा कभी ,
ज़िन्दगी पे लान्नत फेकी ।
पर द्वंद तो कहीं और है ,
शायद तेरे मेरे भीतर कहीं ,
तो  गैरों पे क्या उंगली उठायें ?
क्यों न पहले खुद को 
खुद ही से बचायें ?


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

गुब्बार

पारवती चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश कर रही थी । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा-जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

अभी कल ही की तो बात है जब वो दुल्हन के लाल जोड़े में शर्मा रही थी । दूर पास की बड़ी-बूढी औरतें उसे आसिसें  दे रही थी , हम उम्र अठकेलियाँ कर रही थी और छोटी सपनो भरी निगाहों से उसे निहार रही थी । पारवती का ब्याह पास ही के गाँव के लम्बे-चौड़े नौजवान से तय हुआ था । तो क्या हुआ अगर वो कुछ सांवली थी उसके भाईयों  ने लेन-देन में कोई कसर नहीं रखी थी । कुलजीत  नाम था उसके गबरू लाड़े का । अम्बरसर में कपड़े की मिल में काम करता था । अब गाँव में शहर में नौकरी करने वालों का अलग ही रुतबा रहता था । वही रुतबा उसके पति था तो सभी ब्याह से खूब खुश थे ।

पारवती के  भी पहले कुछ  साल खूब सुख से बीते । उसका ख़सम हर 4-5 महीने में 10-15 दिन की छुट्टी ले के आता, साथ में एक टोटा सूट का लाता , कुछ तोहफ़े थमाता , कुछ दिन मौज कर फिर लौट जाता अपनी नौकरी को । पारवती ने कई बार साथ ले जाने को कहा तो पति ने यह कह कर टाल  दिया की घर पे बूढी माँ का ख्याल कौन रखेगा और फिर उसे घर का इंतज़ाम भी तो करना है  । अभी जिस एक कमरे में वो रहता है वहां थोड़े ही ले जा सकता है उसे । जल्दी ही दो कमरे के क्वार्टर का इंतज़ाम कर के साथ ले जायेगा ।

दिन बीतते रहे, अभी शादी का दूसरा साल चढ़ा ही था कि पारवती का पैर भारी हो गया । अब पति के पास नया बहाना तैयार हो गया कि इस हालत में वहां उसका ख्याल कैसे रखेगा । उसे तो काम पर जाना होता है पीछे से कुछ ऊँच-नीच हो गयी तो? घर पर रहेगी तो माँ देखभाल कर सकेगी ।देखते ही देखते नौ महीने भी गुज़र गए पर पति ने मुड़ के दर्शन नहीं दिए, न ही कभी हाल ही पूछा  । हाँ जब उसकी माँ ने किसी से कह कर तार भिजवाया कि चाँद सा बेटा हुआ है तो भागा चला आया । दो चार दिन खेल कर और हाथ में कुछ पैसे थमा कर लौट गया । फिर महीनों कोई खैर खबर नहीं । हाँ कभी कभी कुछ सौ रुपये का मनी आर्डर आ जाता।

यह सिलसिला चलता रहा - कुछ चार या पांच सावन तो गुज़र ही गए होंगे । कुलजीत को कई ख़त लिखे , अम्बरसर जाते लोगों के मुहं संदेसे भिजवाए पर कोई जवाब नहीं । दूर के एक रिश्तेदार को जब कसमे खिलायीं तो उसने वो बताया जिसने पारवती के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी ।

कुलजीत जिस घर में किराये पे रहता था उसकी मालकिन एक बेवा थी और उस से दस साल बड़ी भी, वह उससे दूजा ब्याह रचा बैठा था । दहेज़ में उसे 15 साल की बेटी भी मिली थी ।यह सब सुनकर पारवती तो जैसे टूट गयी थी, जीने की इच्छा त्याग कर खुदकुशी करने चली थी पर उसके बेटे का मासूम चेहरा उसे रोक गया । उसने जीने की ठानी अपने बेटे के लिए । जो भी हुआ उसमें उस बच्चे का कोई कसूर न था तो वो क्यों खज्जल हो । पारवती ने गाँव के ही कुछ घरों में बर्तन धोने का काम पकड़ा और जैसे तैसे बेटे के लालन पालन में जुट गयी । मनी ऑर्डर अभी भी आते थे पर उसने उन्हें लेना या हाथ लगाना मुनासिब न समझा और हर बार उलटे हाथ लौटा दिया ।

इसके बाद पारवती ने जैसे बरसों का हिसाब रखना बंद ही कर दिया । बस अपने बेटे को देख यह सोचती कि  कब बड़ा हो और वो कोई सुख का दिन देखे ।  बेटा भी इस कच्ची उम्र में ही सयाना हो गया था । अपनी माँ के दर्द को समझता उसे गले लगा कर अक्सर कहता की जब वो बड़ा हो जायेगा तो उसे कोई काम नहीं करने देगा। पारवती इसी आस को सीने से लगा दिन काटती रही ।

फिर मानसून की एक शाम खपरैलों पे खड़-खड़ बजती बारिश के बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई । किवाड़ खोले तो देखा  एक जाना पहचाना सा चेहरा जिसे पानी रिसते प्लास्टिक के बोरे के नीचे से झाँक रहा है । कुलजीत ही था । पारवती ने कुछ नहीं कहा दरवाज़ा खुला छोड़ चौके पर आकर अपना काम करने लगी ।

कुलजीत सामने आ बिन्ने पर बैठ गया । कुछ देर रसोई में सन्नाटा रहा जिसे सिर्फ हांडी में चलती कड़छी की आवाज़ गाहे-बगाहे चीर देती। जब सन्नाटा बहरा करने लगा तो कुलजीत से रहा नहीं गया तो खुद ही आप बीती सुनाने लगा । दूसरी बीवी की लड़की सोलह साल की उम्र में ही गली के किसी आवारा लोफ़र के साथ भाग पड़ी । किसी तरह मान मनोती कर के दोनों परिवारों में मामला सुलटाया और लड़का लड़की की सलीके से शादी करवाई पर वो एक नंबर का कमीना और लालची निकला । दो महीने में ही घर पर  आ धमका कि एक ही लड़की है तो घर इसके नाम करो । कुलजीत की दूसरी बीवी भी गरम दिमाग की थी उसने जब जवाई को हड़काया तो बात तू तू मैं मैं तक पहुँच गयी । तैश में आकर जवाई ने बन्दूक निकल ली । कुलजीत ने बीच बचाव की कोशिश की तो इस हाथ पायी में गोली चल गयी और माँ बेटी दोनों को लील गयी ।

पुलिस ने ससुर दामाद दोनों को धर दबोचा और क़त्ल का मुकदमा ठोक डाला । आखिरकार वकीलों की जेबों पर अपनी जमा पूँजी लुटा कर कुलजीत बरी तो हो गया और दामाद को भी सजा दिलवा ही दी । पर इस रस्साकशी में लगभग दो साल बीत गए और नौकरी जो गयी सो गयी घर भी बिक गया । जब कोई ठौर समझ नहीं आया तो कुलजीत को पारवती की सुध आई । अब सामने बैठ कर गिडगिडा रहा  था कि माफ़ कर दो और साथ रहने दो । गलती का एहसास भी हो गया है और सजा भी मिल गयी है । अब सिर्फ उसका और बेटे का ख्याल रखना चाहता  है । प्रायश्चित करना चाहता है ।

पारवती को  जो अब तक चुप चाप चूल्हे पर राखी हांडी में कड़छी चला रही थी न जाने क्या सूजा कि उसने चूल्हे से सुलगता लकड़ी का चप्पर निकला और कुलजीत के मुहं पर दे मारा । कुलजीत दर्द से कराहता बाहर  की ओर भागा कि शायद बरसते पानी में कुछ ठंडक मिले । पारवती भी जलती मशाल सा चप्पर लिए पीछे लपकी ।

"कम्ज़र्त ! कमीने ! कभी फिर यहाँ का रुख भी किया तो जिंदा जला दूंगी। दोबारा कभी नज़र मत आना ।"

कुलजीत बरसते पानी के परदे में आँख झपकते खो गया । जब तक पारवती को होश आया चप्पर की आग बुझ चुकी थी । वो रसोई की और भारी कदमो से लौट चली।

चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश करने लगी  । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

गुरुवार, 14 जून 2012

कविता और मैं


बिन भाव कविता है क्या ?
मात्र शब्द ही तो हैं ,
और भाव क्या है?
मेरा अक्स ही तो हैं ,
तो कविता मुझसे भिन्न कैसे हो ?
यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?
फिर कैसे करूँ शिकवा ,
जब कोई कहे, 
मज़ा नहीं आया 
कि दिल तक पहुंची नहीं, 
अरे पगले !
कभी हम दिल तक पहुंचे हैं, 
जो कविता दिल तक पहुंचेगी,
यह तो खुद मुझ ही में उलझी है ।
मेरी शंकाओं पर पली है ,
मेरे ही भय पे खेली है,
तो मुझ से आगे कैसे निकले ,
  यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?  

शनिवार, 26 मई 2012

नन्ही सी कोंपल


किसी की घटती बढ़ती
धडकनों के बीच
एक  नन्ही सी
कोंपल  बढ़ रही है
कुदरत  की क्या
अजब तरकीब है
कि एक  ज़िन्दगी में
इक  और  ज़िन्दगी
करवट ले रही  है

कभी घर पे तेरे
कान  लगा
तेरी धडकनों को
सुनता हूँ
टोह कर
तेरी हरकतों को
कैसे खेलूँगा तुझसे
ख्वाब यह बुनता हूँ

हंसी को तेरी
किल्कारियों को
सोचकर आंसूं आते हैं
जब साक्षात्  तू
गोद में खेलेगी
जाने क्या हाल  होगा
ये  सोच   पल-पल 
तेरा इंतज़ार करता हूँ.....

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

हल्का हल्का....


हल्की सी मुस्कराहट,
हल्का हल्का सा नशा,
हल्की सी जुल्फों की बदरी ,
हल्का हल्का सा कहकशा ,
हल्की सी ख़ामोशी तेरी ,
हल्का सा मेरा बहक जाना,
हल्का सा नज़र का झुकना,
हल्का सा शर्मा जाना,
हल्का सा चुपके से तकना,
हल्का से नज़रें चुराना,
सबकुछ हल्का सा जानना,
हल्का सा अंजान हो जाना,
हल्की सी हकीक़त ,
हल्का सा कोई अफसाना,
हल्का सा ख्वाब का बुनना ,
हल्का सा सच हो जाना,
हल्की सी सवालों की शिकान,
हल्का सा हल का खो जाना ,
हल्की हल्की तेरी अदाओं से,
हलक पे मेरे बन जाना ,
हल्की हल्की सी दिल्लगी ये,
हल्का सा कोई रोग पुराना ...........

बुधवार, 1 जून 2011

तुम्हे पाकर यूँ लगा जैसे



तुम्हे पाकर यूँ  लगा जैसे
यह दुनिया छोटी हो गयी है 
दिशाएं कितनी पास आ गयी हैं 
क्षितिज जैसे सिमट के बाहों में आ गया है 
जैसे ज़िन्दगी हर पल, हर लम्हा,
इक नया रंग, नया राग है 
जैसे सारी दुनिया की चहल पहल, 
हमारी बातों में समा गयी है 
जैसे इक अधुरा सा सपना, 
अब पूरा हो चला है 
जैसे मन की बातें, 
अब सिर्फ बातें नहीं रही, 
मीठे जज़्बात हो गयी हैं 
जैसे पन्नो में जोड़ा गया शब्दों के ताना-बाना,
अब केवल कविता नहीं रहा
एक सजीव सृष्टि हो चला है 
जिसे मैं छू सकता हूँ , 
महसूस कर सकता हूँ ,
 कस कर गले लगा सकता हूँ   
जैसे ज़िन्दगी की पूरी किताब,
तेरे होंठों से निकले तीन शब्दों में समा गयी है 
यूँ लगा की जैसे मेरी ख़ुशी, मेरा दर्द, 
अब मेरा नहीं रहा है 
किसी ने सांझा कर लिया है 
सचमुच यह जीवन भी मेरा कहाँ है 
यह तो कब का तेरा हो गया है .......

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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आज Valentine's के दिन

आज  Valentine's के दिन
मोबाइल में तेरी तस्वीर
कहती है कि इस दूरी, उदासी
में भी इक उम्मीद है
रिस-रिस कर बहती नमकीन ज़िन्दगी
में भी कोई कतरा है जो अमृत है
गुप मुरझाये अंधियारे में भी  
तेरी मुस्कराहट से कुछ  रोशनी  है
बंजर वीरानो में भी खनक तेरी आवाज़ की
अक्सर  मिसरी घोलती है
खुश्क हवाओं में एहसास है
कि खुशबु तेरी से कोई कोना अब भी महकता है
अभी बस आहटें हैं, एहसास हैं, अन्देसे हैं...
और बस इंतज़ार है.. बस इंतज़ार है....






रविवार, 19 सितंबर 2010

ज़िन्दगी तू रूकती नहीं...

यह कविता मेरे माता पिता को समर्पित  है और साथ  ही  विश्व के समस्त अभिभावकों को, जो अपने जीवन की तमाम  छोटी  बड़ी खुशियों का परित्याग  करते है ताकि उनके बच्चे एक  बेहतर जीवन  जी सकें, अपने ख्वाबों को पूरा कर सकें । और कहीं  शायद  उम्मीद करते हैं  कि जब वो बूढ़े हों तो यही  बच्चे उनके  बुढ़ापे  की लाठी, उनका सहारा बनें .....


 ज़िन्दगी तू रूकती नहीं ,
शायद तूने रुकना सीखा नहीं 
तू भागती रही और मैं तुझसे कदम 
मिलाने कि जद्दोजहद में जूझता रहा 
पर तूने रुकना नहीं सीखा है 
पैरों में पंख लगे हैं तेरे  शायद ....

कब पालने में थी , कब गोद में 
और  कब कंधे पर 
कब तूने उंगली पकड़ कर चलना सीखा 
जाने कौन, कहाँ से कोई हौंसला जागा 
और तू  हाथ छुड़ा  के दौड़ दी   
भागा मैं तेरे पीछे, थोड़ी  रफ़्तार भी तेज़ की
पर  हर नयी पीढ़ी पिछली से तेज़ भागती है 
आखिर मैंने मोह त्याग ही दिया 
ताकि तू उड़ सके , आसमा की बुलंदी को छू सके
अपने सपनो को पूरा कर सके....
आज दूर खड़ा तेरे फैले पंखों को निहारता हूँ 
ख़ुशी कि तेरी किलकारियों को  
किसी मधुर गीत कि तरह सुनता हूँ 
 और इंतज़ार करता हूँ 
कि जिस हाथ को थाम ,  तूने चलना सीखा है 
उस बूढ़े हाथ की लाठी बनने का भी

शायद तू कभी ख्याल करे ....



रविवार, 6 जून 2010

याद

यह पंक्तियाँ समर्पित हैं मेरी प्रेरणा, मेरी अर्धांगिनी को, जिनके साथ बिताया हर सुखी  पल मुझे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति होने का एहसास करता है और हर दुःख का पल जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला देता है .. 

क्या बात हुई क्या कही सुनी,
दो आँसूं , इक मुस्कान मिली
आज फिर तन्हा सिरहाने में
क्या बयां करूँ क्या जला बुझा,
बस  याद जली विराने में

जां बस ग़मगीन न हो
यूँ  फ़िक्र न कर
सब बढ़ता है सब कट जाएगा
देख वो बादल छटता है
कोई हौले से मुस्काता है
ख़ुशी कोस दूर बस चौक पे है
क्या बात हुई कुछ देर हुई आने में
इक दिन तन्हा और कटा सिरहाने में .........

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

संदेसे


Dallas Lake के किनारे बैठे बैठे ,
मैंने पानी पे न जाने  कितने हर्फ़ उकेरे ,
और तेरी याद में लिखे ख़त लिए ,
लहरें दूसरे किनारे चल दी
इस उम्मीद में  कि उस ओर 
तुम बेसब्री से किसी संदेसे का
इंतज़ार करती होगी  शायद
और इस बात से बिलकुल बेखबर
कि दूसरा किनारा केवल चंद कोस दूर है
पर Seattle उस से भी आगे मीलों दूर 
पता नहीं यह संदेसे तुम्हे मिलेंगे भी या नहीं
पर मैंने तेरी याद में कुछ लफ्ज़ गढ़े ज़रूर हैं...


सोमवार, 8 मार्च 2010

मैं तुझको बहा आया हूँ



वक़्त के बहते दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ 
यादों का तेरी इक गठरा था
मैं उसको छुपा आया हूँ
भुला पाना मुमकिन न था
आँखों में पल पल तू लहराती थी
नाकाम मोह्हब्बत है मेरी तू
मुझको यह बताती थी
भागना चाहता था बहुत
पर जाता भी तो कहाँ
जिस ओर गया , जिस छोर गया
नज़र हरसूं तू आती है
मगर आज़ाद पंछी हूँ मैं
ना जी सकता था
तेरी यादों के पिंजरे में
इसलिए इस दिल को
तेरे चंगुल से छुड़ा लाया हूँ
वक़्त के दरया में
मैं तुझको बहा आया हूँ

रविवार, 7 मार्च 2010

तुम ठहरना प्रिय

सुख के गीत में सुर मिलाने 
सब आयेंगे मगर 
दुःख की रुदाली में कन्धा देने 
तुम ठहरना  प्रिय 

बुलंदी में पलकों पे बिठाने 
सब आयेंगे मगर 
धूल सनी यह देह उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

भरा मयखाना गले उतारने 
सब आयेंगे मगर 
कल टूटे प्याले उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

महका चमन साँसों में बसाने 
सब आयेंगे मगर 
कल मुरझाये फूल  उठाने 
तुम ठहरना प्रिय

आज रसिल यह काय भोगने 
सब आयेंगे मगर 
कल सूखे ठूंठ को पानी देने 
तुम ठहरना प्रिय  

सफ़र में कदम मिलाने 
सब आयेंगे मगर 
अंतिम पड़ाव  पर मेरे करीब 
तुम ठहरना प्रिय

आज मुझ से सहारा लेने 
सब आयेंगे मगर 
कल कमज़ोर यह जिस्म थामने
तुम ठहरना प्रिय .....

निशान

वह आये पास हमारे
लिए पैगाम दोस्ती के सारे
हैरान हम भी हुए
देख अंदाज़ यह प्यारे

" मगर रहने दीजिये
हमें माफ़ कीजिये
चोट खा चुके हैं
इस खेल में
अब दिलचस्बी नहीं अपनी
किसी मेल में "
हाथ रखकर मेरे दिल पर
वह प्यार से बोले
" एक ज़ख्म है तुम्हारे दिल पे
मानते हैं
चोट खा चुके हो तुम ये
जानते हैं
पर ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
कुछ देर में भर जाते हैं "

" हाँ, सच है,
ज़ख्म तो ज़ख्म हैं
जल्द भर जाते हैं
पर निशान,
यह कमबख्त निशान,
फिर भी रह जाते हैं !!"

शनिवार, 6 मार्च 2010

तुम आओ

तुम आओ कि हम 
आस जगाये बैठे हैं 
तुम आओ कि हम 
पलकें बिछाएं बैठे है 
तुम आओ जल्दी कि 
आस टूटने लगी है 
तुम जल्दी आओ कि 
पलकें भीगने लगी हैं..

इंतज़ार हमने किया है बहुत
कि  तुम  आओ
घुट -घुट  के  हमने  जिया  है  बहुत
कि  तुम  आओ
इंतज़ार कि लौ बुझ
 सी गयी  है 
जल्दी  आओ
सांस  थक  सी  गयी  है
तुम  जल्दी  आओ

तुम  जल्दी  आ  जाओ
कि मैं  राह  ताकता  न  रह  जाऊं
वक़्त  कि  इस  धार  में  ही  न  बह  जाऊं
अतेव  मेरे  प्रिय  तुम  आओ
तुम  जल्दी  आ  जाओ 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

ऐसा होता है क्यों?

ऐसा होता है क्यों? 
कि तुम्हारे सामने आते ही 
धड़कन रुक सी जाती है 
सांस थम सी जाती है 
गला सूख जाता है 
ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है 
आँखें चमक उठती है 
मैं कहना चाहता तो हूँ, कुछ मगर 
न जाने क्यों 
सब भूल सा जाता हूँ 
क्यों होता है ऐसा?
ऐसा होता है क्यों? 

और ऐसा भी क्यों होता है 
कि तुम्हारे जाते ही 
धड़कन डूब जाती है 
साँसे भोझिल हो जाती हैं 
गला रूंध जाता है 
जुबान कुछ कहना चाहती नहीं 
आँखें छलक उठती हैं 
क्यों होता है ऐसा?
ऐसा होता है क्यों?

ऐसा क्यों होता है 
यह क्या जादू है 
कि तुम्हारे आगाज़ पर,
फिर तुम्हारी परवाज़ पर 
मैं बेकाबू सा 
इक दीवाना सा हो जाता हूँ 
तुम शम्मा बन जाती हो 
मैं परवाना सा हो जाता हूँ 
क्यों होता है ऐसा?
आखिर, ऐसा होता है क्यों?