मंगलवार, 4 नवंबर 2014

Short Story - The Coach




We got off the train at Nizzamuddin – one of the major railway stations in Delhi. Mathew Perry or Matt as he liked to be called had given the directions over a phone conversation, a day earlier, on where to go. We as in I, my wife and our six year old princess are on our once in a two year vacation to India. Having lived in the US for the last few years this had become our norm and routine.

One of my former colleague and friend from work had visited India around 6 months back and has been here ever since. We have been in touch on Facebook and he expressed his desire to meet once we were here.

“Get off at Nizzamuddin and exit the station from the west gate. After you have walked for about half a mile, ask any shopkeeper for the ‘Dabbewala Gora’, you will be directed to where I live.” Matt had told us.

We did the same and surprisingly he was right, people indeed started giving us directions.

“Not sure what is he doing in this slum; he could have easily stayed in one of the good hotels”, I thought.

Well, we continued to head wherever people pointed us to. If you want to see the reality of development and the growth story in India, you should visit the slums surrounding our airports and railway stations. We Indians believe in the balance of nature. The swanky airports with their squeaky clean toilets are always surrounded by slums with people defecating in the open. Railway stations are a different matter though. They say half of India depends on railways for their commute. I can bet a considerable share lives on railways property – in these illegal slums.

I was walking lost in my thoughts when I stopped to ask for directions once more. The paanwala pointed me towards the other end of the slum where the railway yard was. It was difficult to say where the slum ended and the railway yard started so I checked with someone again. This is the key to finding directions in India. Everyone will help you with them but you need to confirm and reconfirm to make sure you are headed the right way. This guy was courteous enough to walk with me and then finally he banged on one of the abandoned railway coaches.

Out came Matt with a smile and greeted the man who helped us with a ‘Shukriya’. The man waived his hand in acknowledgement and left.

I am sure; it was not difficult to read the bewilderment on my face as Matt invited me in. “An abandoned coach of all the places in the world.” I thought in my head but didn’t say anything.

The inside of the coach was in-fact a surprise. All the seats and contraptions had been removed and the coach was kind of remodeled to have a neatly laid bed, a small office bed and a window AC. “Can you do this? And how the hell are you powering everything and the AC? That entire thing aside, what in the world are you doing here?” I mouthed as many questions as I could in one breath.

Matt lifted the shutter of one of the window and pointed to a diesel genset outside.

“Hmm..clever. How long have you been living here?” I asked.

“About a month”, he replied with a smile.

“And how long are you planning to continue?” I asked gazing in amazement the interior of the coach once more.

“Till someone from the railways finds out; I greased the palms of the yard watchman with a few hundred bucks and a few packs of Marlboro. He hasn’t bothered me since. In fact he has helped me setup this place” he smiled.

“But why?”, I asked.

“Follow me”, he waived his hand and started walking towards the back of the coach. “Look”, he pointed to an embossed strip label reading:

Property of the Indian Railways
Assembled at: Rail Coach Factory, Kapurthala, Punjab.
Chief Engineer/Designer: Andrew Perry


 He put his finger on the name, “My father.”

 “My father came to India on invitation to work at the rail coach factory when my mother was still pregnant with me. He never returned. They say he died of malaria”, he said. “My mother always told me that he was a good man and loved her and was excited about me coming to the world but he didn’t want to let go off a dream opportunity to design a coach for one of the most complex and busiest railway systems in the world. So, he left promising to return at the end of the six month assignment.”

He continued, “I never met him but wanted to know more about him so decided to come to India in the hope of tracing something related to him. I had no luck for the first 4-5 months but in the end after numerous visits to people who had worked with him, I found this. I just wanted to see this and leave but something made me stay. Maybe the thought of staying with my father’s creation would fill a void that he never could.”

There was nothing else to ask, nothing mattered. Silence was the best conversation I could make.











बुधवार, 30 जुलाई 2014

सिक्के



जेब में पलछिन्नो के,
कुछ अठन्नी भर सिक्के रखे हैं,
कुछ कच्चे, कुछ पक्के,
कुछ दुक्कियाँ, कुछ इक्के रखे हैं,
यह सिक्के मैं तुझ तक पहुँचाऊँ कैसे,
कमबख़्त फ़ासला बहुत है, 
पल भर में उड़ कर आऊँ कैसे !


गुरुवार, 3 जुलाई 2014

घोंसले का मेहमान





रोज़ सूरज का चेहरा देख,

उम्मीदों की हवाओं पर, 

पंख फैला देता हूँ ,
और सूरज पंख जला कर,
जिस्म ख़ाक कर देता है ।
 
अरे भटके मेघ ज़रा

सूरज को गले लगा
हवा तू मुझे कंधे पे उठा
चल ज़रा ज़ोर लगा !

अपने घोंसले में मेहमान 
बनना अब सहा नहीं जाता
बिना तोतली हँसी के
अब रहा नहीं जाता ।


बुधवार, 16 अप्रैल 2014

पांच साल हो जाने पर....

पांच साल बीत भी गए,
कुछ लम्हों में बीते,
कुछ अरसों में… 
ज़िन्दगी की यही रवायत है शायद 
साथ पलक झपकने का होता है 
और हिज़्र बरसों का… 
आज फिर चौराहे पर हैं हम 
और बदनसीबी के चौक पे 
लैंडस्केपिंग नहीं  
रुके वक़्त का गन्दा तालाब है। 
या बर्लिन की दीवार है शायद 
जिसके एक तरफ मैं हूँ 
और दूसरी तरफ तुम 
और है हफ़्ते में दो दिन का वीसा 
तुम से, आरना से, माँ से मिलने का..... 
जानता हूँ हंसी, ख़ुशी, ठिठोली के मौके थे कम 
और दुःख, आंसू, तकलीफ का कोटा मोटा,
पर पांच बीते हैं, पांच सौ बाकी.... 
रास्ता अभी लम्बा है, देखते हैं 
ज़िन्दगी और क्या है दिखाती है  … 

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

कुछ दूर चलो


कुछ दूर चलो 
हम घूम आए ,
बारी - बारी ,
साथ गए तो 
यहाँ चुप होगी 
नहीं गए तो 
शोर बहुत 
चल कुछ दूर यूँही 
बस घूम आएं 
बारी - बारी। 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

एक छोटी सी राम कहानी...

एक था राम | एक था रावण | दोनों टकराये, शायद रूहें बदल गयी | राम की रूह रावण के साथ मर गयी और रावण की रूह राम में जिंदा रही | सीता पहले भी अपमानित हुई और बाद में भी | 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

आरना के पहले जन्मदिन पर




साढ़े आठ मोती जब
तेरी हँसी से झाँकते है 
सवेरा घुटनों पे चल के
मेरी गोद में आता है ।

रब्ब और क़रीब लगता है
उसकी आरती जब लोरी बन
तेरी नींदों के कैनवस पर
ख़्वाबों को बुनती है

"माँ करें दिन रात सेवा,
पर बाप-बेटी आपस में चमचे हैं"
'उजा' की झूठी जलन के ताने
अब गीतों से लगते हैं
माँ की ममता के अफ़साने 
जबसे जगरातों में देखें हैं ।

राक्षस की जान नन्हे से तोते में
ऐसी कहानियों पे यक़ीं नहीं था मुझको
पर जब से तू आई है 'आरना'
'इजे' को कहानी का यक़ीं आ गया है ।

हसीं तेरी जब रूह का शर्बत बनती है
डबडबाई आँखे जब कलेजे को छनती है
राक्षस की जान नन्हे से तोते में
ख़ुद-ब्-खुद यक़ीं आ जाता है
सवेरा  आजकल ख़ुद घुटनों पे 
चल के मेरी गोद में आता है ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

बारीशों में नंगे सिर




बारीशों में नंगे सिर,
कभी चल के देखा है,
बूँदें लपक के,
चूमने को आती हैं,
गाड़ी के शीशे,
नीचे कर के देखो
हवा कुछ और ही,
गीत सुनाती है
बस बिन कुछ कहे,
यूँही मुस्कुरा के देखो,
अंजाने खुद-ब-खुद
अपने से लगते हैं
अपने ही डर की दीवारों 
में जो क़ैद हैं हम 
इक ईंट गिरा के देखो
दुनिया कुछ हॅसीन लगती है…


मंगलवार, 16 जुलाई 2013

वक़्त



काश वक़्त किसी जर्जर हवेली की,
वो पुरानी स्थिर सीढ़ी सा होता,
पल भर में भाग कर अपने, 
माज़ी के माथे को चूम लेता ।
पर वक़त किसी चमकते मौल के,
ऐस्केलेटर सा है शायद,
जिसपर भागना मना है, 
मंज़िल तक ले तो जायेगा,
पर अपनी रफ़्तार से, 
बदले वक़्त की यही क़ीमत है शायद ।।

शुक्रवार, 10 मई 2013

यादों की चादर





महफ़िलो के करघों पर, 
जब दोस्तों की बातें 
उलझते, सुलझते फिर उलझते,
दिलकश दास्ताँ 
बन उभरती है 
दिल में यादों की चादर
थोड़ी और लम्बी
 थोड़ी और रंगी 
हो जाती है !

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

अंतर्द्वंद



कौन रौंद रहा है तुम्हें ?
और कौन है जो मुझे 
पल पल पीस रहा है ?
सोचा वक़्त को इलज़ाम दूँ ,
किस्मत को बुरा भला कहूँ,
रब को भी कोसना चाहा कभी ,
ज़िन्दगी पे लान्नत फेकी ।
पर द्वंद तो कहीं और है ,
शायद तेरे मेरे भीतर कहीं ,
तो  गैरों पे क्या उंगली उठायें ?
क्यों न पहले खुद को 
खुद ही से बचायें ?


गुरुवार, 22 नवंबर 2012

गुब्बार

पारवती चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश कर रही थी । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा-जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

अभी कल ही की तो बात है जब वो दुल्हन के लाल जोड़े में शर्मा रही थी । दूर पास की बड़ी-बूढी औरतें उसे आसिसें  दे रही थी , हम उम्र अठकेलियाँ कर रही थी और छोटी सपनो भरी निगाहों से उसे निहार रही थी । पारवती का ब्याह पास ही के गाँव के लम्बे-चौड़े नौजवान से तय हुआ था । तो क्या हुआ अगर वो कुछ सांवली थी उसके भाईयों  ने लेन-देन में कोई कसर नहीं रखी थी । कुलजीत  नाम था उसके गबरू लाड़े का । अम्बरसर में कपड़े की मिल में काम करता था । अब गाँव में शहर में नौकरी करने वालों का अलग ही रुतबा रहता था । वही रुतबा उसके पति था तो सभी ब्याह से खूब खुश थे ।

पारवती के  भी पहले कुछ  साल खूब सुख से बीते । उसका ख़सम हर 4-5 महीने में 10-15 दिन की छुट्टी ले के आता, साथ में एक टोटा सूट का लाता , कुछ तोहफ़े थमाता , कुछ दिन मौज कर फिर लौट जाता अपनी नौकरी को । पारवती ने कई बार साथ ले जाने को कहा तो पति ने यह कह कर टाल  दिया की घर पे बूढी माँ का ख्याल कौन रखेगा और फिर उसे घर का इंतज़ाम भी तो करना है  । अभी जिस एक कमरे में वो रहता है वहां थोड़े ही ले जा सकता है उसे । जल्दी ही दो कमरे के क्वार्टर का इंतज़ाम कर के साथ ले जायेगा ।

दिन बीतते रहे, अभी शादी का दूसरा साल चढ़ा ही था कि पारवती का पैर भारी हो गया । अब पति के पास नया बहाना तैयार हो गया कि इस हालत में वहां उसका ख्याल कैसे रखेगा । उसे तो काम पर जाना होता है पीछे से कुछ ऊँच-नीच हो गयी तो? घर पर रहेगी तो माँ देखभाल कर सकेगी ।देखते ही देखते नौ महीने भी गुज़र गए पर पति ने मुड़ के दर्शन नहीं दिए, न ही कभी हाल ही पूछा  । हाँ जब उसकी माँ ने किसी से कह कर तार भिजवाया कि चाँद सा बेटा हुआ है तो भागा चला आया । दो चार दिन खेल कर और हाथ में कुछ पैसे थमा कर लौट गया । फिर महीनों कोई खैर खबर नहीं । हाँ कभी कभी कुछ सौ रुपये का मनी आर्डर आ जाता।

यह सिलसिला चलता रहा - कुछ चार या पांच सावन तो गुज़र ही गए होंगे । कुलजीत को कई ख़त लिखे , अम्बरसर जाते लोगों के मुहं संदेसे भिजवाए पर कोई जवाब नहीं । दूर के एक रिश्तेदार को जब कसमे खिलायीं तो उसने वो बताया जिसने पारवती के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी ।

कुलजीत जिस घर में किराये पे रहता था उसकी मालकिन एक बेवा थी और उस से दस साल बड़ी भी, वह उससे दूजा ब्याह रचा बैठा था । दहेज़ में उसे 15 साल की बेटी भी मिली थी ।यह सब सुनकर पारवती तो जैसे टूट गयी थी, जीने की इच्छा त्याग कर खुदकुशी करने चली थी पर उसके बेटे का मासूम चेहरा उसे रोक गया । उसने जीने की ठानी अपने बेटे के लिए । जो भी हुआ उसमें उस बच्चे का कोई कसूर न था तो वो क्यों खज्जल हो । पारवती ने गाँव के ही कुछ घरों में बर्तन धोने का काम पकड़ा और जैसे तैसे बेटे के लालन पालन में जुट गयी । मनी ऑर्डर अभी भी आते थे पर उसने उन्हें लेना या हाथ लगाना मुनासिब न समझा और हर बार उलटे हाथ लौटा दिया ।

इसके बाद पारवती ने जैसे बरसों का हिसाब रखना बंद ही कर दिया । बस अपने बेटे को देख यह सोचती कि  कब बड़ा हो और वो कोई सुख का दिन देखे ।  बेटा भी इस कच्ची उम्र में ही सयाना हो गया था । अपनी माँ के दर्द को समझता उसे गले लगा कर अक्सर कहता की जब वो बड़ा हो जायेगा तो उसे कोई काम नहीं करने देगा। पारवती इसी आस को सीने से लगा दिन काटती रही ।

फिर मानसून की एक शाम खपरैलों पे खड़-खड़ बजती बारिश के बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई । किवाड़ खोले तो देखा  एक जाना पहचाना सा चेहरा जिसे पानी रिसते प्लास्टिक के बोरे के नीचे से झाँक रहा है । कुलजीत ही था । पारवती ने कुछ नहीं कहा दरवाज़ा खुला छोड़ चौके पर आकर अपना काम करने लगी ।

कुलजीत सामने आ बिन्ने पर बैठ गया । कुछ देर रसोई में सन्नाटा रहा जिसे सिर्फ हांडी में चलती कड़छी की आवाज़ गाहे-बगाहे चीर देती। जब सन्नाटा बहरा करने लगा तो कुलजीत से रहा नहीं गया तो खुद ही आप बीती सुनाने लगा । दूसरी बीवी की लड़की सोलह साल की उम्र में ही गली के किसी आवारा लोफ़र के साथ भाग पड़ी । किसी तरह मान मनोती कर के दोनों परिवारों में मामला सुलटाया और लड़का लड़की की सलीके से शादी करवाई पर वो एक नंबर का कमीना और लालची निकला । दो महीने में ही घर पर  आ धमका कि एक ही लड़की है तो घर इसके नाम करो । कुलजीत की दूसरी बीवी भी गरम दिमाग की थी उसने जब जवाई को हड़काया तो बात तू तू मैं मैं तक पहुँच गयी । तैश में आकर जवाई ने बन्दूक निकल ली । कुलजीत ने बीच बचाव की कोशिश की तो इस हाथ पायी में गोली चल गयी और माँ बेटी दोनों को लील गयी ।

पुलिस ने ससुर दामाद दोनों को धर दबोचा और क़त्ल का मुकदमा ठोक डाला । आखिरकार वकीलों की जेबों पर अपनी जमा पूँजी लुटा कर कुलजीत बरी तो हो गया और दामाद को भी सजा दिलवा ही दी । पर इस रस्साकशी में लगभग दो साल बीत गए और नौकरी जो गयी सो गयी घर भी बिक गया । जब कोई ठौर समझ नहीं आया तो कुलजीत को पारवती की सुध आई । अब सामने बैठ कर गिडगिडा रहा  था कि माफ़ कर दो और साथ रहने दो । गलती का एहसास भी हो गया है और सजा भी मिल गयी है । अब सिर्फ उसका और बेटे का ख्याल रखना चाहता  है । प्रायश्चित करना चाहता है ।

पारवती को  जो अब तक चुप चाप चूल्हे पर राखी हांडी में कड़छी चला रही थी न जाने क्या सूजा कि उसने चूल्हे से सुलगता लकड़ी का चप्पर निकला और कुलजीत के मुहं पर दे मारा । कुलजीत दर्द से कराहता बाहर  की ओर भागा कि शायद बरसते पानी में कुछ ठंडक मिले । पारवती भी जलती मशाल सा चप्पर लिए पीछे लपकी ।

"कम्ज़र्त ! कमीने ! कभी फिर यहाँ का रुख भी किया तो जिंदा जला दूंगी। दोबारा कभी नज़र मत आना ।"

कुलजीत बरसते पानी के परदे में आँख झपकते खो गया । जब तक पारवती को होश आया चप्पर की आग बुझ चुकी थी । वो रसोई की और भारी कदमो से लौट चली।

चूल्हे में लकड़ी डाल सुलगाने की कोशिश करने लगी  । जल्द ही सारी रसोई धुंए से भर उठी और धुआं पारवती के फेफड़ों के कोनो को जलाने लगा और आखों से गंगा जमुना छलक उठी  । जाने आज लकड़ी सीनी थी या उसके ही मन का गुब्बार था जो फुट पड़ा था , वह तय नहीं कर पायी । बस दीवार से सर टिका निढाल हो गयी ।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ !!



दिवाली की रात आई,
टिम - टिम करते दीप जले,
दीप जले और तारे बने,
तारे बने तेरी आँखों के,
आँखों के वो ख़्वाब बने ,
ख़्वाब सभी सच ये साल बने,
जीवन यूँ खुश हाल बने ।।

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ !! 


रविवार, 21 अक्टूबर 2012

लोरी

यह छोटी सी लोरी है जो मैं अपनी बिटिया को सुलाते समय गुनगुनाता हूँ .....


आरना जी सो जाओ,
आँखों को बंद कर लो,
सपनों में खो जाओ,
सपनों में खोकर तुम,
दूर गगन उड़ जाओ,
उड़ उड़ कर आरना,
दूर देश घूम आओ,
दूर देश घूम कर तुम,
सबसे मिल के आ जाओ,
सबसे मिल के तुम तो,
प्यार बहुत सा ले आओ,
प्यार सब का ले के तुम,
जल्दी बड़े हो जाओ,
आरना जी सो जाओ,
सपनों में खो जाओ |

शनिवार, 14 जुलाई 2012

गुवाहटी से क्षुब्द होकर ......

आगे बढ़ना है हमे ,
आसमां छूना है ,
नया भारत कहना है खुद को ...
फ़िर भी गुडगाँव , गुवाहटी
या अपने ही घर में ,
क्यों आधा भारत ....
 सिर्फ सिसकियाँ भरता है ?
रात को घर से निकलते डरता है
बर्बरता से मुर्दित अस्मिता सहलाता है
नमकीन आंसुओं का मरहम लगता है ....

और शेष आधा ...
या तो नीच निशाचर बन
भूखे भेडिये सा
शिकार ढूंढता 
रस्ते पर घूमता है
या फ़िर निस्तब्द तमाशबीन
घर की इज्ज़त
तार तार होते बस ताकता है ।

मंदिर में जिसको पूजते हैं
उसी को सड़कों पर
वेहशी बन कर नोचते हैं
क्या आगे बढ़ रहे हैं हम ,
क्या तो आसमा छुएंगे
और क्या ही नया है हम में ....
क्या ही नया है ??

गुरुवार, 14 जून 2012

कविता और मैं


बिन भाव कविता है क्या ?
मात्र शब्द ही तो हैं ,
और भाव क्या है?
मेरा अक्स ही तो हैं ,
तो कविता मुझसे भिन्न कैसे हो ?
यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?
फिर कैसे करूँ शिकवा ,
जब कोई कहे, 
मज़ा नहीं आया 
कि दिल तक पहुंची नहीं, 
अरे पगले !
कभी हम दिल तक पहुंचे हैं, 
जो कविता दिल तक पहुंचेगी,
यह तो खुद मुझ ही में उलझी है ।
मेरी शंकाओं पर पली है ,
मेरे ही भय पे खेली है,
तो मुझ से आगे कैसे निकले ,
  यह तो मेरी ही है ,
तुम्हारी कैसे हो ?  

शनिवार, 26 मई 2012

नन्ही सी कोंपल


किसी की घटती बढ़ती
धडकनों के बीच
एक  नन्ही सी
कोंपल  बढ़ रही है
कुदरत  की क्या
अजब तरकीब है
कि एक  ज़िन्दगी में
इक  और  ज़िन्दगी
करवट ले रही  है

कभी घर पे तेरे
कान  लगा
तेरी धडकनों को
सुनता हूँ
टोह कर
तेरी हरकतों को
कैसे खेलूँगा तुझसे
ख्वाब यह बुनता हूँ

हंसी को तेरी
किल्कारियों को
सोचकर आंसूं आते हैं
जब साक्षात्  तू
गोद में खेलेगी
जाने क्या हाल  होगा
ये  सोच   पल-पल 
तेरा इंतज़ार करता हूँ.....

रविवार, 1 जनवरी 2012

Story: The Jhelum Waters


Shinu lives in the Avantipura village in the beautiful Kashmir valley with his grandmother. Their house is surrounded by lush green fields on the banks of the Jhelum. The Himalayas overlook their house and the surrounding fields. Shinu’s favorite pass time is to graze the cattle at the meadow beyond the fields and then sit on the banks of Jhelum gazing at the roaring waters and the multiple cascades it forms flowing through the big rocks in its path. 
Shinu’s parents died when he was two years old and since then his grandmother has been looking after him. The best part of being with the Grandmother was her bed time stories. He loved her stories but they were often interrupted by the sound of bullets and explosions far away in the distance. He had often seen men carrying guns going around in Army uniforms and often in civilian dresses. But he never understood who they were and he was too scared to talk to them. Whenever he saw anyone with a gun he held his breath and waited for them to pass and go out of sight. 

One such night he asked his grandmother, “Dadi, who are these gun carrying men?”
“Strangers”, his Dadi replied.

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

हल्का हल्का....


हल्की सी मुस्कराहट,
हल्का हल्का सा नशा,
हल्की सी जुल्फों की बदरी ,
हल्का हल्का सा कहकशा ,
हल्की सी ख़ामोशी तेरी ,
हल्का सा मेरा बहक जाना,
हल्का सा नज़र का झुकना,
हल्का सा शर्मा जाना,
हल्का सा चुपके से तकना,
हल्का से नज़रें चुराना,
सबकुछ हल्का सा जानना,
हल्का सा अंजान हो जाना,
हल्की सी हकीक़त ,
हल्का सा कोई अफसाना,
हल्का सा ख्वाब का बुनना ,
हल्का सा सच हो जाना,
हल्की सी सवालों की शिकान,
हल्का सा हल का खो जाना ,
हल्की हल्की तेरी अदाओं से,
हलक पे मेरे बन जाना ,
हल्की हल्की सी दिल्लगी ये,
हल्का सा कोई रोग पुराना ...........

बुधवार, 1 जून 2011

तुम्हे पाकर यूँ लगा जैसे



तुम्हे पाकर यूँ  लगा जैसे
यह दुनिया छोटी हो गयी है 
दिशाएं कितनी पास आ गयी हैं 
क्षितिज जैसे सिमट के बाहों में आ गया है 
जैसे ज़िन्दगी हर पल, हर लम्हा,
इक नया रंग, नया राग है 
जैसे सारी दुनिया की चहल पहल, 
हमारी बातों में समा गयी है 
जैसे इक अधुरा सा सपना, 
अब पूरा हो चला है 
जैसे मन की बातें, 
अब सिर्फ बातें नहीं रही, 
मीठे जज़्बात हो गयी हैं 
जैसे पन्नो में जोड़ा गया शब्दों के ताना-बाना,
अब केवल कविता नहीं रहा
एक सजीव सृष्टि हो चला है 
जिसे मैं छू सकता हूँ , 
महसूस कर सकता हूँ ,
 कस कर गले लगा सकता हूँ   
जैसे ज़िन्दगी की पूरी किताब,
तेरे होंठों से निकले तीन शब्दों में समा गयी है 
यूँ लगा की जैसे मेरी ख़ुशी, मेरा दर्द, 
अब मेरा नहीं रहा है 
किसी ने सांझा कर लिया है 
सचमुच यह जीवन भी मेरा कहाँ है 
यह तो कब का तेरा हो गया है .......

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