गुरुवार, 10 नवंबर 2011

हल्का हल्का....


हल्की सी मुस्कराहट,
हल्का हल्का सा नशा,
हल्की सी जुल्फों की बदरी ,
हल्का हल्का सा कहकशा ,
हल्की सी ख़ामोशी तेरी ,
हल्का सा मेरा बहक जाना,
हल्का सा नज़र का झुकना,
हल्का सा शर्मा जाना,
हल्का सा चुपके से तकना,
हल्का से नज़रें चुराना,
सबकुछ हल्का सा जानना,
हल्का सा अंजान हो जाना,
हल्की सी हकीक़त ,
हल्का सा कोई अफसाना,
हल्का सा ख्वाब का बुनना ,
हल्का सा सच हो जाना,
हल्की सी सवालों की शिकान,
हल्का सा हल का खो जाना ,
हल्की हल्की तेरी अदाओं से,
हलक पे मेरे बन जाना ,
हल्की हल्की सी दिल्लगी ये,
हल्का सा कोई रोग पुराना ...........

बुधवार, 1 जून 2011

तुम्हे पाकर यूँ लगा जैसे



तुम्हे पाकर यूँ  लगा जैसे
यह दुनिया छोटी हो गयी है 
दिशाएं कितनी पास आ गयी हैं 
क्षितिज जैसे सिमट के बाहों में आ गया है 
जैसे ज़िन्दगी हर पल, हर लम्हा,
इक नया रंग, नया राग है 
जैसे सारी दुनिया की चहल पहल, 
हमारी बातों में समा गयी है 
जैसे इक अधुरा सा सपना, 
अब पूरा हो चला है 
जैसे मन की बातें, 
अब सिर्फ बातें नहीं रही, 
मीठे जज़्बात हो गयी हैं 
जैसे पन्नो में जोड़ा गया शब्दों के ताना-बाना,
अब केवल कविता नहीं रहा
एक सजीव सृष्टि हो चला है 
जिसे मैं छू सकता हूँ , 
महसूस कर सकता हूँ ,
 कस कर गले लगा सकता हूँ   
जैसे ज़िन्दगी की पूरी किताब,
तेरे होंठों से निकले तीन शब्दों में समा गयी है 
यूँ लगा की जैसे मेरी ख़ुशी, मेरा दर्द, 
अब मेरा नहीं रहा है 
किसी ने सांझा कर लिया है 
सचमुच यह जीवन भी मेरा कहाँ है 
यह तो कब का तेरा हो गया है .......

QR code for this post in case you want access it on your phone/tablet: http://bit.ly/l1iaex




रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आज Valentine's के दिन

आज  Valentine's के दिन
मोबाइल में तेरी तस्वीर
कहती है कि इस दूरी, उदासी
में भी इक उम्मीद है
रिस-रिस कर बहती नमकीन ज़िन्दगी
में भी कोई कतरा है जो अमृत है
गुप मुरझाये अंधियारे में भी  
तेरी मुस्कराहट से कुछ  रोशनी  है
बंजर वीरानो में भी खनक तेरी आवाज़ की
अक्सर  मिसरी घोलती है
खुश्क हवाओं में एहसास है
कि खुशबु तेरी से कोई कोना अब भी महकता है
अभी बस आहटें हैं, एहसास हैं, अन्देसे हैं...
और बस इंतज़ार है.. बस इंतज़ार है....






रविवार, 19 सितंबर 2010

ज़िन्दगी तू रूकती नहीं...

यह कविता मेरे माता पिता को समर्पित  है और साथ  ही  विश्व के समस्त अभिभावकों को, जो अपने जीवन की तमाम  छोटी  बड़ी खुशियों का परित्याग  करते है ताकि उनके बच्चे एक  बेहतर जीवन  जी सकें, अपने ख्वाबों को पूरा कर सकें । और कहीं  शायद  उम्मीद करते हैं  कि जब वो बूढ़े हों तो यही  बच्चे उनके  बुढ़ापे  की लाठी, उनका सहारा बनें .....


 ज़िन्दगी तू रूकती नहीं ,
शायद तूने रुकना सीखा नहीं 
तू भागती रही और मैं तुझसे कदम 
मिलाने कि जद्दोजहद में जूझता रहा 
पर तूने रुकना नहीं सीखा है 
पैरों में पंख लगे हैं तेरे  शायद ....

कब पालने में थी , कब गोद में 
और  कब कंधे पर 
कब तूने उंगली पकड़ कर चलना सीखा 
जाने कौन, कहाँ से कोई हौंसला जागा 
और तू  हाथ छुड़ा  के दौड़ दी   
भागा मैं तेरे पीछे, थोड़ी  रफ़्तार भी तेज़ की
पर  हर नयी पीढ़ी पिछली से तेज़ भागती है 
आखिर मैंने मोह त्याग ही दिया 
ताकि तू उड़ सके , आसमा की बुलंदी को छू सके
अपने सपनो को पूरा कर सके....
आज दूर खड़ा तेरे फैले पंखों को निहारता हूँ 
ख़ुशी कि तेरी किलकारियों को  
किसी मधुर गीत कि तरह सुनता हूँ 
 और इंतज़ार करता हूँ 
कि जिस हाथ को थामतूने चलना सीखा है 
उस बूढ़े हाथ की लाठी बनने का भी

शायद तू कभी ख्याल करे ....



रविवार, 6 जून 2010

याद

यह पंक्तियाँ समर्पित हैं मेरी प्रेरणा, मेरी अर्धांगिनी को, जिनके साथ बिताया हर सुखी  पल मुझे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति होने का एहसास करता है और हर दुःख का पल जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला देता है .. 

क्या बात हुई क्या कही सुनी,
दो आँसूं , इक मुस्कान मिली
आज फिर तन्हा सिरहाने में
क्या बयां करूँ क्या जला बुझा,
बस  याद जली विराने में

जां बस ग़मगीन न हो
यूँ  फ़िक्र न कर
सब बढ़ता है सब कट जाएगा
देख वो बादल छटता है
कोई हौले से मुस्काता है
ख़ुशी कोस दूर बस चौक पे है
क्या बात हुई कुछ देर हुई आने में
इक दिन तन्हा और कटा सिरहाने में .........